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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
तेषामाधिरथिः क्रुद्धो यतमानान्मनस्विनः |  ४५   क
विचिन्वन्नेव वाणाग्रैः समासादय़दग्रतः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति