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द्रोण पर्व
अध्याय १२९
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सञ्जय़ उवाच
प्रभद्रकाश्च पाञ्चालाः षट्सहस्राः प्रहारिणः |  १०   क
द्रोणमेवाभ्यवर्तन्त पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति