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द्रोण पर्व
अध्याय १२९
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सञ्जय़ उवाच
तमसा चावृते लोके न प्राज्ञाय़त किञ्चन |  १९   क
सैन्येन रजसा चैव समन्तादुत्थितेन ह ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति