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आदि पर्व
अध्याय १२०
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च |  ५   क
भृशं सन्तापय़ामास देवराजं स गौतमः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति