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शान्ति पर्व
अध्याय ३१
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नारद उवाच
ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् |  २४   क
वभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति