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स्त्री पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येन चक्षुषा पश्यन्मनसानुद्धतेन च |  ५   क
सर्वप्राणभृतां भावं स तत्र समवुध्यत ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति