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शल्य पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
चरन्तौ विविधान्मार्गान्हार्दिक्यशिनिपुङ्गवौ |  १३   क
मुहुरन्तर्दधाते तौ वाणवृष्ट्या परस्परम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति