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वन पर्व
अध्याय १८९
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मार्कण्डेय़ उवाच
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव |  २३   क
एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति