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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा वनं त्वमिदमागतः |  ७८   क
वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति