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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
अस्त्रमस्त्रेण सर्वेषामेतेषां मधुसूदन |  ३२   क
मय़ा द्रक्ष्यसि निर्भिन्नं जय़द्रथवधैषिणा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति