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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
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वासुदेव उवाच
स त्वमिष्ट्वा महाय़ज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः |  २१   क
लोके कीर्तिं परां प्राप्य गतिमग्र्यां गमिष्यसि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति