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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
नानृते कुरुषे भावं कच्चिद्धर्मे च वर्तसे |  ६   क
मतापित्रोश्च ते वृत्तिः कच्चित्पार्थ न सीदति ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति