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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजाय़ प्रेषय़ामास पार्थिवः |  १०   क
स च तद्वचनात्सर्वं समानिन्ये महीपतिः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति