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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
शृण्वन्त्येकाग्रमनसो व्राह्मणाः कुरुजाङ्गलाः |  १३   क
क्षत्रिय़ाश्चैव वैश्याश्च शूद्राश्चैव समागताः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति