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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रान्तोऽस्मि वय़सानेन तथा पुत्रविनाकृतः |  १८   क
उपवासकृशश्चास्मि गान्धारीसहितोऽनघाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति