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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
पुत्र विश्रम्यतां तावन्ममापि वलवाञ्श्रमः |  ५   क
इत्युक्त्वा प्राविशद्राजा गान्धार्या भवनं तदा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति