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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
स भीमसेने निष्क्रान्ते मृगय़ार्थमरिन्दमे |  ५   क
अन्यद्रूपं समास्थाय़ विकृतं भैरवं महत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति