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सभा पर्व
अध्याय १३
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श्रीकृष्ण उवाच
पृथक्त्वेन द्रुता राजन्सङ्क्षिप्य महतीं श्रिय़म् |  ४८   क
प्रपतामो भय़ात्तस्य सधनज्ञातिवान्धवाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति