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सभा पर्व
अध्याय १३
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श्रीकृष्ण उवाच
एवं वय़ं जरासन्धादादितः कृतकिल्विषाः |  ५३   क
सामर्थ्यवन्तः सम्वन्धाद्भवन्तं समुपाश्रिताः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति