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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
हतेषु युधि पार्थेषु राजसूय़े तथा त्वय़ा |  १०   क
आहृतेऽहं नरश्रेष्ठ त्वां सभाजय़िता पुनः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति