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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
तथेति चोक्त्वा विवुधा जग्मू राजन्यथागतम् |  ४७   क
त्रितश्चाप्यगमत्प्रीतः स्वमेव निलय़ं तदा ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति