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वन पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं सुय़ुद्धे पार्थेन जिताहं मधुसूदन |  १०३   क
स्वय़ंवरे महत्कर्म कृत्वा नसुकरं परैः ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति