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शान्ति पर्व
अध्याय १४५
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भीष्म उवाच
यश्चेदं शृणुय़ान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तय़ेत् |  १७   क
नाशुभं विद्यते तस्य मनसापि प्रमाद्यतः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति