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द्रोण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
सिंहनादान्भृशं चक्रुः शङ्खान्दध्मुश्च हर्षिताः |  ३७   क
भेरीश्च वादय़ामासुर्मृदङ्गांश्चानकैः सह ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति