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कर्ण पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
निमज्जतस्तानथ कर्णसागरे; विपन्ननावो वणिजो यथार्णवे |  २२   क
उद्दध्रिरे नौभिरिवार्णवाद्रथैः; सुकल्पितैर्द्रौपदिजाः स्वमातुलान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति