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वन पर्व
अध्याय १३
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अर्जुन उवाच
शतं शतसहस्राणि सुवर्णस्य जनार्दन |  २२   क
एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि भागशः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति