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वन पर्व
अध्याय ९५
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अगस्त्य उवाच
यद्येष कामः सुभगे तव वुद्ध्या विनिश्चितः |  २४   क
हन्त गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति