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वन पर्व
अध्याय १३
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अर्जुन उवाच
न क्रोधो न च मात्सर्यं नानृतं मधुसूदन |  ३२   क
त्वय़ि तिष्ठति दाशार्ह न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति