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वन पर्व
अध्याय १३
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अर्जुन उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि सङ्क्षिप्य मधुसूदन |  ३४   क
आत्मन्येवात्मसात्कृत्वा जगदास्से परन्तप ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति