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सभा पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किञ्चन पार्थिवाः |  ८१   क
कर्णो दुःशासनं त्वाह कृष्णां दासीं गृहान्नय़ ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति