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वन पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु भार्या पार्थानां तव कृष्ण सखी विभो |  ५३   क
धृष्टद्युम्नस्य भगिनी सभां कृष्येत मादृशी ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति