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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ि सर्वं समासज्य कुटुम्वं भरतर्षभाः |  ५२   क
उपासनरताः सर्वे घटन्ते स्म शुभानने ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति