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शल्य पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
न हि मे मोक्ष्यते कश्चित्परेषामिति चिन्तय़े |  १९   क
ये त्वद्य समरं कृष्ण न हास्यन्ति रणोत्कटाः |  १९   ख
तान्वै सर्वान्हनिष्यामि यद्यपि स्युरमानुषाः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति