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विराट पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
त्यजामि दारान्मम ये पुरातना; भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि |  १२   क
अहं च ते सुन्दरि दासवत्स्थितः; सदा भविष्ये वशगो वरानने ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति