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विराट पर्व
अध्याय १३
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द्रौपद्यु उवाच
परदारास्मि भद्रं ते न युक्तं त्वय़ि साम्प्रतम् |  १४   क
दय़िताः प्राणिनां दारा धर्मं समनुचिन्तय़ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति