विराट पर्व  अध्याय १३

वैशम्पाय़न उवाच

याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशां पते |  २   क
अवसत्परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय़ ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति