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विराट पर्व
अध्याय १३
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द्रौपद्यु उवाच
त्वं कालरात्रीमिव कश्चिदातुरः; किं मां दृढं प्रार्थय़सेऽद्य कीचक |  २१   क
किं मातुरङ्के शय़ितो यथा शिशु; श्चन्द्रं जिघृक्षुरिव मन्यसे हि माम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति