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विराट पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कृपश्च कर्णश्च द्रोणश्च रथिनां वरः |  ४   क
तं महास्त्रैर्महावीर्यं परिवार्य धनञ्जय़म् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति