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शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
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भीष्म उवाच
न चास्य हीय़ते वर्णो न ग्लानिरुपजाय़ते |  २२   क
त्रय़ाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति