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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
वृहस्पतिर्वा देवेषु शुक्रो वाप्यसुरेषु यः |  १३   क
न तथा वुद्धिसम्पन्नो यथा स पुरुषर्षभः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति