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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
मुदिताः पाण्डुतनय़ा मनोहृदय़नन्दनम् |  ३७   क
विविशुः क्रमशो वीरा अरण्यं शुभकाननम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति