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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
वृणोमि कीर्तिं लोके हि जीवितेनापि भानुमन् |  ३१   क
कीर्तिमानश्नुते स्वर्गं हीनकीर्तिस्तु नश्यति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति