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वन पर्व
अध्याय २९९
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रच्छन्नं चापि धर्मज्ञ हरिणा वृत्रनिग्रहे |  १५   क
वज्रं प्रविश्य शक्रस्य यत्कृतं तच्च ते श्रुतम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति