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भीष्म पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वय़ं रक्षति केशवः |  ५   क
प्रजापतिमुपासीनः प्रजानां विदधे सुखम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति