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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिजग्राह रामस्तं स्वागतेन महामनाः |  ४७   क
सुग्रीवस्य तु शङ्काभूत्प्रणिधिः स्यादिति स्म ह ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति