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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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युधिष्ठिर उवाच
आय़ुष्मान्केन भवति स्वल्पाय़ुर्वापि मानवः |  २   क
केन वा लभते कीर्तिं केन वा लभते श्रिय़म् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति