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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
शल्यस्तु नकुलं वीरः स्वस्रीय़ं प्रिय़मात्मनः |  २९   क
विव्याध प्रहसन्वाणैर्लाडय़न्कोपय़न्निव ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति