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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुः कृपेनास्ताञ्छित्त्वा वहुविधाञ्शरान् |  ३१   क
कृपं विव्याध सप्तत्या लक्ष्म चास्याहरत्त्रिभिः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति