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वन पर्व
अध्याय २८१
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सत्यवानु उवाच
सुचिरं वत सुप्तोऽस्मि किमर्थं नाववोधितः |  ६३   क
क्व चासौ पुरुषः श्यामो योऽसौ मां सञ्चकर्ष ह ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति