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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
व्यचरत्स तदा राजन्सेनां विक्षोभय़न्प्रभुः |  ६   क
वर्धय़ामास सन्त्रासं शात्रवाणाममानुषम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति