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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
वाह्यमाभ्यन्तरं चैव चरन्तौ मार्गमुत्तमम् |  ६५   क
ददृशाते महात्मानौ सपक्षाविव पर्वतौ ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति